GD&T (Geometric Dimensioning & Tolerancing) – वास्तविक फैक्ट्री अनुभव पर आधारित पूर्ण व्यावहारिक मार्गदर्शिका
यह लेख किताबों से नहीं, बल्कि मशीन शॉप ke personal exeperience से लिखा गया है। यह उन लोगों के लिए है जो ड्रॉइंग को हाथ में लेकर मशीन के सामने खड़े होते हैं, जो CNC प्रोग्राम में X, Y, Z लिखते समय यह सोचते हैं कि “क्या यह पार्ट सच में फिट होगा?” और जो इंस्पेक्शन रिपोर्ट पर साइन करते समय यह जिम्मेदारी महसूस करते हैं कि एक गलत पास पूरी असेंबली को बर्बाद कर सकता है।
अगर आपने कभी यह देखा है कि सारे डायमेंशन टॉलरेंस में होने के बावजूद भी पार्ट असेंबली में नहीं बैठा, तो यह लेख आपके लिए है।
यह कोई थ्योरी-क्लास वाला लेख नहीं है। यह GD&T को एक इंजीनियरिंग भाषा के रूप में समझाने का प्रयास है। एक ऐसी भाषा जो डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और इंस्पेक्शन – तीनों को एक ही पेज पर लाती है।
यह लेख सरल देवनागरी हिन्दी में लिखा गया है, ताकि मशीनिस्ट, सुपरवाइज़र, क्वालिटी इंजीनियर और डिजाइनर – सभी इसे बिना डर, बिना शब्दकोश के पढ़ सकें।
भाग 1: कड़वी सच्चाई – 90% लोग GD&T जानते हैं, फिर भी फैक्ट्री में नुकसान क्यों होता है?
ड्रॉइंग आई। हर फीचर पर ± टॉलरेंस दिया गया था। CNC पर पार्ट बना। इंस्पेक्शन ने माइक्रोमीटर और CMM से चेक किया। सब कुछ ठीक।
लेकिन असेंबली लाइन पर पहुंचते ही समस्या शुरू हो गई।
बोल्ट आधा घुसा, फिर जाम। शाफ्ट घूमना चाहिए था, लेकिन फँस गया। दो प्लेट्स के बीच गैप आ गया।
इसके बाद वही रोज़ का खेल:
असेंबली बोले – मशीनिंग गलत है। मशीनिंग बोले – ड्रॉइंग के अनुसार बनाया है। इंस्पेक्शन बोले – सब टॉलरेंस में है।
यहाँ कोई झूठ नहीं बोल रहा था। फिर भी नुकसान हो चुका था।
असल समस्या यह थी कि ड्रॉइंग ने यह कभी बताया ही नहीं कि कौन सा फीचर सबसे महत्वपूर्ण है और कौन सी त्रुटि स्वीकार्य है और कौन सी नहीं।
यहीं से GD&T की असली ज़रूरत शुरू होती है।
भाग 2: ± डायमेंशन क्यों आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग में फेल हो जाते हैं
प्लस-माइनस डायमेंशन यह मानकर चलता है कि:
“अगर हर साइज सही है, तो पार्ट सही होगा।”
लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई भी मशीन आदर्श ज्योमेट्री नहीं बनाती।
हर प्रक्रिया कुछ न कुछ त्रुटि लाती है:
टूल का झुकना। स्पिंडल रनआउट। थर्मल एक्सपेंशन। क्लैम्पिंग डिस्टॉर्शन।
अब सोचिए, जब एक पार्ट में 10–15 फीचर होते हैं, तो ये सभी त्रुटियाँ जुड़ती जाती हैं।
इसी को टॉलरेंस स्टैक-अप कहते हैं।
GD&T इसी स्टैक-अप को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है, ना कि सिर्फ साइज बताने के लिए।
भाग 3: GD&T क्या है – और क्या नहीं है
GD&T केवल चिन्हों का कलेक्शन नहीं है।
यह यह नहीं कहता:
“यह होल इतना होना चाहिए।”
यह कहता है:
“यह होल इस पार्ट के काम करने के लिए कितना बिगड़ सकता है, फिर भी स्वीकार्य रहेगा।”
GD&T एक समझौता है:
डिज़ाइन कहता है – मुझे फंक्शन चाहिए। मैन्युफैक्चरिंग कहती है – मुझे प्रैक्टिकल टॉलरेंस चाहिए। इंस्पेक्शन कहता है – मुझे मापने लायक नियम चाहिए।
GD&T इन तीनों को जोड़ता है।
भाग 4: GD&T का मूल दर्शन – जिसे समझे बिना सब बेकार है
4.1 साइज, फॉर्म, ओरिएंटेशन और लोकेशन अलग-अलग समस्याएँ हैं
डायमीटर केवल साइज कंट्रोल करता है।
लेकिन यह नहीं बताता कि:
होल सीधा है या टेढ़ा। होल सही जगह है या नहीं। होल सतह के लंबवत है या नहीं।
इसीलिए GD&T में अलग-अलग कंट्रोल होते हैं:
फॉर्म – फ्लैटनेस, स्ट्रेटनेस, राउंडनेस। ओरिएंटेशन – पैरालेलिज़्म, पर्पेंडिक्युलैरिटी। लोकेशन – पोज़िशन। शेप – प्रोफाइल।
4.2 पहले असेंबली, फिर ड्रॉइंग
अच्छी ड्रॉइंग हमेशा असेंबली से शुरू होती है।
यह नहीं पूछा जाता:
“मशीन पर क्या आसान है?”
यह पूछा जाता है:
“असेंबली में कौन सा फीचर पार्ट को रोकता है, पोज़िशन देता है?”
जो फीचर पार्ट को असेंबली में सबसे पहले लॉक करता है, वही प्राथमिक डैटम होना चाहिए।
भाग 5: डैटम – GD&T की रीढ़
5.1 डैटम को सरल शब्दों में समझें
डैटम कोई वास्तविक सतह नहीं है। यह एक आदर्श संदर्भ है।
वास्तविक सतह पर खरोंच है, वेविनेस है, फ्लैटनेस त्रुटि है।
लेकिन GD&T उस सतह से एक परफेक्ट रेफरेंस प्लेन मान लेता है।
जैसे:
फ़र्श – Primary Datum दीवार – Secondary Datum दूसरी दीवार – Tertiary Datum
आपकी स्थिति इन्हीं से तय होती है।
5.2 3-2-1 नियम – फैक्ट्री का सबसे अनदेखा नियम
Primary datum – 3 डिग्री ऑफ फ्रीडम रोकता है। Secondary datum – 2 रोकता है। Tertiary datum – 1 रोकता है।
अगर यह क्रम बदला, तो पूरा GD&T अर्थ बदल जाता है।
यही वजह है कि एक ही ड्रॉइंग अलग-अलग फैक्ट्रियों में अलग रिज़ल्ट देती है।
5.3 सुविधाजनक डैटम बनाम कार्यात्मक डैटम
गलत सोच:
“यह सतह CMM पर पकड़ना आसान है।”
सही सोच:
“यह सतह असेंबली में पार्ट को रोकती है।”
डैटम हमेशा असेंबली से चुना जाना चाहिए, ना कि इंस्पेक्शन सुविधा से।
भाग 6: फीचर कंट्रोल फ्रेम – GD&T की आत्मा
फीचर कंट्रोल फ्रेम चार सवालों का जवाब देता है:
कौन सा कंट्रोल? कितनी टॉलरेंस? किस डैटम के सापेक्ष? किस कंडीशन पर?
इसी छोटे से बॉक्स में पूरा इंजीनियरिंग इंटेंट छिपा होता है।
भाग 7: पोज़िशन टॉलरेंस – सबसे शक्तिशाली और सबसे गलत समझा गया कंट्रोल
पोज़िशन केवल होल की जगह नहीं बताता।
यह बताता है:
होल कितना टेढ़ा हो सकता है। होल कितना ऑफसेट हो सकता है। और फिर भी असेंबली चलेगी या नहीं।
यही कारण है कि पोज़िशन ± डायमेंशन से कई गुना बेहतर है।
भाग 8: MMC, LMC और बोनस टॉलरेंस – लागत बचाने का सबसे बड़ा हथियार
MMC का मतलब है:
Maximum Material Condition यानी सबसे ज़्यादा मटीरियल।
जैसे:
होल का सबसे छोटा डायमीटर।
MMC पर GD&T देने से मैन्युफैक्चरिंग को बोनस टॉलरेंस मिलता है।
इसका सीधा मतलब:
कम स्क्रैप। ज़्यादा पास रेट। कम लागत।
भाग 9: प्रोफाइल टॉलरेंस – एक कंट्रोल, कई समस्याओं का समाधान
प्रोफाइल कंट्रोल:
फॉर्म भी कंट्रोल करता है। लोकेशन भी। ओरिएंटेशन भी।
जहाँ जटिल शेप हो, वहाँ प्रोफाइल सबसे साफ समाधान है।
भाग 10: CNC प्रोग्रामिंग और इंस्पेक्शन में GD&T का सही उपयोग
GD&T सिर्फ ड्रॉइंग तक सीमित नहीं है।
यह CNC सेटअप में गाइड देता है। यह इंस्पेक्शन प्लान बनाता है। यह डिस्प्यूट खत्म करता है।
जब मशीनिस्ट, इंस्पेक्टर और इंजीनियर एक ही GD&T भाषा बोलते हैं, तो फैक्ट्री शांत चलती है।
निष्कर्ष: GD&T डर नहीं, नियंत्रण है
GD&T जटिल इसलिए लगता है क्योंकि उसे गलत तरीके से सिखाया जाता है।
असल में GD&T अनुमान को हटाकर नियंत्रण लाता है।
अगर आप GD&T को चिन्ह नहीं, इंजीनियरिंग सोच की तरह अपनाएँ, तो:
असेंबली फेल कम होगी। स्क्रैप कम होगा। और आपकी विश्वसनीयता बढ़ेगी।
यही GD&T का असली उद्देश्य है।
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